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खेलपत्र नमस्कार। एशियाई खेलों में भारत के खिलाड़ियों द्वारा प्रदर्शन तारीफ करने लायक है। इंडोनेशिया के जकार्ता में चल रहे 18वें एशियाई खेलों की हेप्टाथलन स्पर्धा में स्वप्रा बर्मन ने गोल्ड मेडल जीत कर साबित कर दिया है कि मुश्किलों के आने के बाद भी डट कर मुसीबतों का सामना करने वालों की कभी हार नहीं होती है। आपको बता दें कि स्वप्रा बर्मन ने इस स्पर्धा में जीतने वाली भारत की पहली महिला बन गई है।

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स्वप्रा दांत के दर्द के बावजूद इस सात स्पर्धाओं में कुल 6026 अंकों के साथ पहले स्थान हासिल किया। 21 साल की इस एथलीट ने वो कारनामा कर दिखाया जिसके बारें में शायद ही किसी ने सोचा होगा।

स्वप्रा गरीब परिवार से आती है। उनकी मां चाय के बगान में मजदूरी करती है और पिता पंचम बर्मन रिक्शा चलाते हैं, लेकिन उम्र के साथ लगी बिमारी के चलते वह बिस्तर पर है। इसके साथ स्वप्रा की ट्रेनिंग काफी मुश्किल हो जाती है। स्वप्रा का जीवन बेहद ही संघर्षों भरा रहा है।

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आपको जानकार हैरानी होगी की स्वप्रा के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां है। जिसकी वजह से उनको जूते पहनकर दौड़ने में काफी दिक्कत होती है। पांव की ज्यादा चौड़ाई स्वप्रा के खेलों में उसकी लैंडिंग को काफी मुश्किल होती है, इसी कारण उनके जूते जल्दी फट जाते है। लेकिन तमाम मुश्किलों के आने के बावजूद भी स्वप्रा ने गोल्ड मेडल जीतकर दिखा दिया है कि वह किसी से कम नहीं है।

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