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(चित्र: फेसबुक)

।।खेलपत्र नमस्कार।।
नई दिल्ली। फीफा का बुख़ार आज से दूनिया के हर कोने में रहने वाले लोगों पर चढ़ने वाला है। और नशा भी ऐसा जो इतना मदहोश कर दे कि कुछ और दिखे ही नहीं। ऐसा नशा जो हर किसी की आंखों में देखने को मिलेगा। क्योंकि आज हर कोई टीवी पर फीफा वर्ल्ड कप 2018 जो देखेगा। जी हां आपने सही सुना फीफा, फीफा और सिर्फ फीफा- अभी तो प्यार भी हुआ किसी को तो उसका नाम कहीं फीफा ना रख दें दीवाने। अगर आपको यकीन ना हो तो कल का अखबार या अपने करीबियों का सोशल मीडिया अकाउंट खोलकर देख लीजिएगा आपको विश्वास हो जाएगा कि जो हमने कहा वो 100 प्रतिशत सच है। सच के सिवा और कुछ नहीं है।

वर्ल्ड कप के अब तक के कुछ खास मैच:

वर्ल्ड कप लोगों का जुनून बन गया है, हर कोई इन मैचों को देखने के लिए जोशोख़रोश से भरा रहता है। लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि वो कौन से मैच थे जिन्हें लोग आज भी नहीं भूले हैं।

1950 में उरुग्वे-ब्राजील के बीच हुआ मैच

यह मैच फुटबॉल के प्रकांड पंडितों के चुनिंदा मैचों में से है वो भी ऐसा जिसने दिलों को घायल भी किया और बहुत सारे दिलों को तोड़ा भी। तो इस दिलतोड़ और दिलजोड़ किस्से पे जाते हैं लेकिन पहले उस वर्ल्ड कप की कुछ विशेष नियम।
1950 में हुए इस फीफा वर्ल्ड कप में अंतिम चार टीमों के बीच नॉक ऑउट मुकाबले ना होकर रॉउड रॉबिन आधार पर अंतिम ग्रुप स्टेज के मुकाबले हुए थे। जी हां आपने सही पढ़ा, दिमाग़ की बत्ती जला दी थी आयोजकों ने। इन नियमों के जख़ीरे के अनुसार ब्राजील को स्वीडन और स्पेन को 7-1 और 6-1 से हराकर वर्ल्ड कप जीतने की जरूरत थी।

और दीवानों की ऐसी बारात दिखी मारकाना में, कि दो लाख़ से ज़्यादा लोग पहुँच गए मैच देखने। ऐसा तो पानीपत की लड़ाई में भी नहीं हुआ था, मतलब पिछला जो भी रिकॉर्ड रहा होगा उसको कुचल कुचल कर तोड़ दिया दीवानों ने। इस प्रचंड प्रशंसक समूह के सामने ब्राजील ने आधे समय के बाद फ्रिएका के एक गोल के बाद मैच अपने पाले में रख लिया था, 1-0 के स्कोर से। उरुग्वे में भी बाहुबली और भल्लाल देव जैसा जज़्बा, उन्होंने आख़िरी 25 मिनट में जुआन अल्बर्टो शियाफिनो और अल्काइड्स घिगिया की मदद से दो गोल किए और मैच के सिकंदर हो गए।

1966 में इंग्लैंड और पश्चिम जर्मनी के बीच हुआ मैच

इंग्लैंड और जर्मनी खेल में सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी प्रतिद्वंद्वियों में से हैं। तो भइया चर्चा का बाजार हो फीफा का, तो इनके बिना वो चाय बिना चीनी होगा। तो चाय पे चर्चा आगे बढ़ाते हुए हम इस मैच पर जाते हैं। 1966 का फाइनल उन मैचों में से एक है जो इंग्लैंड जीता तो ज़रूर पर बिना पेशानी पर पसीना पाए नहीं।
हिटलर के देश जर्मनी ने अंग्रेजों के गोलपोस्ट को ऐसे भेदा जैसे कोई तीरंदाज हो। पर मैच ही क्या जहाँ रोमांच ना हो, कुछ देर में ही इंग्लैंड ने कदमताल बराबर कर दिया- माने कि स्कोर बराबर। बात यहीं रुक जाती तो और बात थी पर ना रुकी ना रुकने को तैयार थी। मार्टिन पीटर्स बने सूरमा और उन्होंने इंग्लैंड को दोबारा बढ़त दिला दी।

आशिक़ और खिलाडी हार मान जाएँ ऐसा होता नहीं। और वुल्फगैंग वेबर ने एक गोल करके एक्स्ट्रा टाइम के लिए मजबूर किया। इस गोल ने इंग्लैंड के कीपर को पूरी तरह परेशान कर दिया था। पर एक्स्ट्रा टाइम के बाहुबली हुए इंग्लैंड जो जीत पाने में कामयाब रही।

1970 में ब्राजील और इंग्लैंड के बीच हुआ मैच

1970 में ब्राजील और इंग्लैंड द्वारा खेला गया टूर्नामेंट लोगों का पसंदीदा टूर्नामेंट रहा- वो भी ऐसा जो सारे फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में शामिल है। इस टूर्नामेंट की चर्चा आज भी लोग करते हैं चाहे वो चाय पे चर्चा हो या समोसे की रेहड़ी। लेकिन साथ ही इस बात की चर्चा भी करते हैं कि महामहिम पेले और जैरज़िन्हो कितने घमंड़ी थे, वहीं दूसरी ओर इंग्लैंड होलडर, बॉबी मूर और गॉर्डन बैंक टूर्नामेंट के बेस्ट गोलकीपर और डिफेंडर रहे।

इंग्लैंड इस मैच में हर संभव कोशिश के बाद भी चौधरी नहीं बन पाया मैच का, क्यूंकि मैच का सनी देओल ब्राज़ील के पास था। और ब्राज़ील ने इंग्लैंड की ये कोशिश नाकाम कर दी और 1-0 से मात दे दी।

1982 में इटली और ब्राजील के बीच हुआ मैच


ब्राजील को वर्ल्ड कप जीतने वाली सबसे बड़ी टीम माना जाता है, ऐसी टीम जो मानो स्टेडियम में परमाणु बम से हमला करती हो विरोधियों पे, लेकिन 1982 में ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि आप कितने भी ताकतवर हो लेकिन जब तक आप जीतते नहीं तब-तक आप कहीं नहीं पहुंचते। इस बार ब्राजील को इटली ने घर का रास्ता दिखाया और 3-2 से हराया।

2014 में जर्मनी और ब्राजील के बीच हुआ मैच


अपने घर पर होने वाले इस वर्ल्ड कप में हर ओर डंका था नेमार और ब्राजील का। दुनिया भर के लोगों को ब्राज़ील से बहुत उम्मीदें थी। और वे सेमीफाइनल में पहुंचकर कुछ हद तक उन उम्मीदों के राजा बन चुके थे। यहाँ तक तो राह के कांटे हटाते चले थे, पर अब सामने थी जर्मनी। कहते हैं सामने वाली टीम को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए, वरना आप कब मुंह के बल गिरो पता भी नहीं चलेगा। ठीक ऐसा ही हुआ ब्राजील के साथ- अपने कॉम्पेटिटर को कमजोर समझना ब्राजील को भारी पड़ा और जर्मनी ने उसे 7-1 से ऐसा रौंदा कि नानी याद आ गयी होगी।

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